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Sunday, 24 March 2019

हाइपर एक्टिव है बच्चा, ताे इस तरह से रखें ध्यान

आपका बच्चा बेवजह आपा खोए, हर समय सक्रिय रहे, फोकस न कर पाए, स्कूल में असामान्य हरकत करे, हर समय बोले या दूसरों को न बोलने दे तो विशेषज्ञ की सलाह लें क्योंकि यह एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर हो सकता है। इसकी जांच के लिए कई तरह के ब्लड टेस्ट व हार्मोनल टेस्ट होते हैं। खानपान में गड़बड़ की पड़ताल कर मनोवैज्ञानिक उपचार किया जाता है।आइए जानते हैं इसके बारे में:-

करें खास उपाय
हाइपर एक्टिविटी और उसकी किस्म के हिसाब से दवाएं मौजूद हैं। इनसे भी ज्यादा जरूरी है माता-पिता की सूझबूझ व समझाइश। जैसे-

- माता-पिता को सबसे पहले यह समझना चाहिए कि उनका बच्चा दूसरे बच्चों से अलग है लेकिन असामान्य नहीं। बच्चे की एक्टिविटी को सबसे पहले घरवालों को स्वीकार करना चाहिए लेकिन दूसरों के सामने बार-बार उसे असामान्य न कहें। ऐसा करने से बच्चे में हीन भावना बढ़ने लगती है और वह धीरे-धीरे जिद्दी होकर मनमर्जी करने लगता है।

- उसकी क्षमता पहचानते हुए उसे वही काम करने के लिए प्रेरित करें। बच्चे को ऐसा कोई काम न करने के लिए कहें जो उसकी रुचि या क्षमता के मुताबिक न हो।

- हाइपर एक्टिव बच्चे पर दबाव न डालें। वह जो भी हॉबी करना चाहे उसे रोके नहीं। बल्कि उसका हौंसला बढ़ाने के लिए एक्टिविटी में भाग लें।

- बच्चे की शारीरिक व मानसिक जरूरत को समझें। उसके साथ समय बिताएं व उसकी बातों को ध्यान से सुनें। 10-15 मिनट रोजाना विचार सुनने से हाइपर एक्टिव बच्चे को समझना आसान होगा।

- बच्चे में बेहतर खानपान की आदत डालें। खाने में साबुत अनाज, फल, सब्जियां आदि शामिल करें।

- मित्र या भाई-बहन केे साथ बच्चे की तुलना न करें।

- बच्चे को नियमित एक्सरसाइज कराएं। एरोबिक से तनाव कम होता है और शारीरिक व मानसिक एनर्जी बढ़ती है। एंडॉर्फिन हार्मोन का स्राव होने से बच्चा खुश रहता है और बात-बात पर चिड़चिड़ा महसूस नहीं करता। इसलिए बच्चे को रोजाना 30 मिनट एक्सरसाइज कराएं।

बच्चे को ये सिखाएं
- गहरी सांस का अभ्यास कराएं। गुस्सा या चिड़चिड़ेपन की स्थिति में गहरी सांस उपचार का काम करती है।
- घरेलू काम में बच्चों को शामिल करें। साथ ही उन्हें जिम्मेदारी भी सौंपें।
- बच्चे को घुमाने ले जाएं। उन्हें खेलने दें और स्कूल के काम व खेल के बीच संतुलन बनाना सिखाएं।
- बच्चों की किसी भी हरकत पर फौरन प्रतिक्रिया न दें। उनके साथ खुद भी धैर्यवान बनें।
- बच्चा अगर शर्मीला है तो उसे अपने साथ सामाजिक कार्यक्रमों में लेकर जाएं। उसे गु्रप में रहने के लिए प्रेरित करें। लेकिन यह भी ध्यान रखें कि कोई बच्चे का मजाक न बनाए।
- घर में किसी प्रकार का झगड़ा या कलह है तो इसे बच्चे के सामने न आने दें। इससे बच्चे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

विशेषज्ञ की राय
ऐसे मामले इन दिनों ज्यादा देखने में आ रहे हैं। लेकिन माता-पिता निराश न हों। दवाओं और पर्याप्त चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक परामर्श से बच्चों की एकाग्रता में सुधार किया जा सकता है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को समझें। उन्हें दंड देने या किसी अन्य बच्चे से उसकी तुलना करने से बचें। बच्चे की हिम्मत बढ़ाएं और इसके लक्षण पहचानते ही डॉक्टर से तुरंत परामर्श करें।



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