इंसानी जिंदगी सांसों पर टिकी है और सांस टिकी है फेफड़ों पर। हमारे फेफड़े जितने मजबूत होंगे, जिंदगी उतनी ही लंबी होगी। मौसम के परिवर्तन से लेकर घर-बाहर के धुएं तक सब हमारे फेफड़ों को प्रभावित करते हैं।
मौसम में बदलाव से सर्दी, जुकाम, छींकें आना, एलर्जी, एलर्जिक राइनाइटिस, आंखों से पानी आना और अस्थमा आदि का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में जरूरी है कि हम अपनी सेहत का खासतौर पर खयाल रखें क्योंकि एलर्जन सबसे पहले हमारी नाक, फिर गले व आखिर में फेफड़ों पर हमला करते हैं।
गीली घास पर न चलें
अस्थमा, साइनस या एलर्जी होने पर सर्दी के मौसम में देर रात तक बाहर न निकलें। साथ ही एकदम सुबह घूमने के लिए न जाएं। गीली घास पर नंगे पांव न चलें वर्ना अस्थमा का अटैक पड़ सकता है। घर की सफाई के लिए डस्टिंग की बजाय गीले कपड़े से पौंछें व मुंह पर कपड़ा रखें। पटाखों के धुएं से भी परेशानी बढ़ सकती है।
बच्चों की देखभाल
बड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है इसलिए इनकी तुलना में बच्चों व वृद्धों पर मौसम के बदलाव का सबसे ज्यादा असर पड़ता है। बच्चों को सर्दी के मौसम में ज्यादा बाहर न लेकर जाएं। उनके सिर को मंकी कैप आदि से कवर करके रखें। उन्हें निक्कर या शॉर्ट ड्रेस पहनाने के बजाय बॉडी को कवर करने वाले गर्म कपड़े पहनाएं। जो बच्चे अस्थमा के मरीज हैं उन्हें डॉक्टरी सलाह से दवाएं दें।
ये हैं प्रमुख वजह
धूल, धुंआ, तापमान में बदलाव, परागकण, त्योहारों के मौसम में साफ-सफाई के दौरान गर्द व सर्दी की शुरुआत में निकाले गए रजाई-गद्दों में मौजूद डस्ट माइट्स।
विशेषज्ञ की राय
छींक आदि के समय मुंह पर कपड़ा या रुमाल रखें।
खानपान: ठंडी व खट्टी चीजें जैसे अमचूर, इमली, अचार व चटनी आदि से परहेज करें। फ्रिज की ठंडी चीजों को उनका तापमान सामान्य होने पर खाएं-पिएं। तला-भुना आदि खाने के बाद फौरन पानी न पिएं वर्ना गले की तकलीफ हो सकती है।
इलाज : रोग होने पर विशेषज्ञ की सलाह से दवाएं लें क्योंकि वे पहले रिलीवर व प्रिवेंटर डोज देते हैं।
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