शुक्राणुओं का न होना, उनकी गुणवत्ता या संख्या में कमी की वजह से प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है। ऐसा तीन कारणों से होता है। पहला, प्री-टेस्टीक्यूलर जिसमें पिट्यूटरी ग्रंथि और मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस से ऐसे हार्मोन स्रावित होते हैं जो शुक्राणुओं की क्षमता को प्रभावित करते हैं। दूसरा, टेस्टीज (वृषण) में जन्मजात विकृति, चोट, संक्रमण या ट्यूमर होने पर भी असर पड़ता है। तीसरा, पोस्ट-टेस्टीक्यूलर में शुक्राणु बनते तो हैं लेकिन शुक्रवाहिनी में रुकावट होने पर परेशानी आती है।
खराब लाइफस्टाइल से कितना प्रभाव पड़ता है?
धूम्रपान, तंबाकू और शराब के सेवन जैसी आदतों से प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है। इसके अलावा स्टेरॉइड्स और टॉक्सिक दवाएं लेने पर रक्त के माध्यम से वीर्य प्रभावित होता है।
किस विशेषज्ञ को दिखाएं?
संतानहीनता होने पर भ्रामक विज्ञापनों या शर्तिया इलाज करने वालों के चक्कर में आने के बजाय पुरुष सबसे पहले यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करें।
इसका पता कैसे चलता है?
सबसे पहले विशेषज्ञ वीर्य में शुक्राणु की मात्रा व गुणवत्त्ता जानने के लिए सीमन एनालिसिस करवाते हैं। जांच में गड़बड़ी पाए जाने पर टेस्टीक्यूलर बायोपसी व हार्मोन थैरेपी की जरूरत हो सकती है।
उपचार क्या है?
टेस्टीज में रुकावट होने पर माइक्रो सर्जरी से इसे दूर किया जाता है। शुक्राणु बनने की क्षमता यदि कम हो तो वैरीकोसिरेकटॉमी कर संख्या बढ़ाई जाती है। इसके अलावा हार्मोन थैरेपी से इलाज किया जाता है। उपरोक्त इलाज यदि सफल न हो तो आईवीएफ तकनीक से वीर्य में से कुछ शुक्राणुओं को लेकर इसे लैब में फर्टिलाइज किया जाता है। इसके अलावा सीमन बैंक की मदद भी ली जा सकती है।
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