देश में सर्वाइकल कैंसर के प्रतिवर्ष करीब एक लाख नए मामले सामने आते हैं। विश्व में इस कैंसर से होने वाली मौतों में लगभग एक तिहाई सिर्फ भारत में होती हैं।
कैंसर के प्रकारों में पांचवा सबसे सामान्य कैंसर सर्वाइकल कैंसर है। ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) की वजह से यह कैंसर होता है। सर्वाइकल कैंसर महिला के जीवन में उत्पादक अवधि के दौरान जोर पकड़ता है। ऐसे मामले 30-34 साल की उम्र में होते हैं और 55-65 साल की उम्र में सबसे अधिक देखने को मिलते हैं। यौन संबंधों को लेकर सक्रिय महिलाएं 50 वर्ष की उम्र तक आते-आते आनुवांशिक एचपीवी का शिकार हो जाती हैं।
कम उम्र में खतरा
विशेषज्ञाें के अनुसार सर्वाइकल कैंसर महिलाओं को बहुत कम उम्र में प्रभावित कर रहा है। विकासशील देशों में ऐसी तकनीकें व सस्ते परीक्षण उपकरण मौजूद हैं जिनसे सर्वाइकल कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
समय रहते हो बचाव
नियमित परीक्षण से महिलाएं आसानी से सर्वाइकल कैंसर से बच सकती हैं क्योंकि गर्भाश्य में होने वाले कोशिकीय परिवर्तनों का उपचार यदि ठीक तरह से न किया जाए तो यह सर्वाइकल कैंसर का रूप ले सकता है।
पैप स्मीयर टेस्ट: कैंसर के लक्षणों की पहचान करने में मदद करता है।
एचपीवी टेस्ट : यह उन विषाणुओं की जांच करता है जो सर्विक्स पर इन कोशिकीय बदलावों का कारण हो सकते हैं। अगर दोनों परीक्षणों का परिणाम नकारात्मक रहता है तो सर्वाइकल कैंसर का खतरा बहुत ही कम है। ऐसे में विशेषज्ञ की सलाह से महिलाएं दोबारा यह परीक्षण पांच साल बाद करा सकती हैं।
टीकाकरण
सर्वाइकल कैंसर से बचाव के तहत टीकाकरण द्वारा बचाव सबसे उपयुक्त विकल्प के तौर पर उभर रहा है। एचपीवी टीकाकरण की मदद से आने वाले दशकों में सर्वाइकल कैंसर के बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सर्वाइकल कैंसर की वजह से सबसे अधिक मौतें कम और मध्यम आय वाले देशों में होती हैं, जहां टीके व जांच की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
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