बच्चे की इम्युनिटी कमजोर है तो बीमारी का खतरा
आपने अक्सर सुना होगा कि गर्भावस्था में मां के विचारों का असर उसके होने वाले शिशु पर भी पड़ता है। पौराणिक कथाओं में इसके कई वर्णन हैं। महाभारत में अभिमन्यु का चक्रव्यूह भेदने का पूरा राज न जान पाने का कारण गर्भावस्था के दौरान उसकी माता सुभद्रा का इसके बारे में सुनते हुए सो जाना माना गया था। होम्योपैथी के बारे में कहा जाता है कि यह मर्ज की जड़ का इलाज करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि बीमार होने से लेकर ठीक होने तक व्यक्ति के व्यवहार और उसकी सोच की भी भूमिका होती है। होम्योपैथी के डॉक्टर मरीज के लक्षणों के साथ उसके व्यवहार व उसकी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े कई संकेतों को भी देखते हैं। यदि किसी को भूख नहीं लग रही है या उसे कमजोरी महसूस हो रही है तो होम्योपैथी में इन्हें बीमारी के बाहरी लक्षण के रूप में देखा जाएगा। अब डॉक्टर यह जानने की कोशिश करेंगे कि उसके व्यवहार में ऐसा क्या हो रहा है जो इस बीमारी के कारण या जड़ से जुड़ता है। उसके साथ जरूर कुछ न कुछ ऐसा हो रहा होगा जो सामान्यत: उस बीमारी के मरीज के साथ नहीं होता होगा। इन्हीं के बारे में विस्तार से जानकार होम्योपैथी विशेषज्ञ उस मरीज के प्रमुख लक्षणों को पहचानते हैं और इसी आधार पर दवाइयां दी जाती हैं। इसीलिए फीडिंग कराते वक्त मां की मानसिक स्थिति शांत व स्थिर होनी चाहिए क्योंकि मां के दूध के जरिये शिशु के शरीर में एंजाइम्स के साथ विषैले टॉक्सिक तत्व भी जाते हैं। यदि फीडिंग के वक्त मां गुस्सा या तनाव करेगी तो उसके शरीर में इन्हें बढ़ाने वाले एंजाइम्स व टॉक्सिंस रिलीज होंगे जो दूध के जरिये शिशु के शरीर में पहुंचेंगे। लेकिन यहां इसका मतलब यह नहीं है कि हर बच्चे के लिए ये नुकसानदायक होंगे। सिर्फ कमजोर रोग प्रतिोधक क्षमता वाले बच्चों में ही इन तत्वों का असर होगा।
(एक्सपर्ट: डॉ. सुमनलता मीना, होम्योपैथी चिकित्सक)
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